-शिक्षक और समाज
लेखनी श्री कुमार श्री
व्यक्ति के व्यक्तित्व का सृजन शिक्षा द्वारा ही संभव है और शिक्षक वह देवत्व आत्मा है जो इस संजीवनी को प्राप्त करने में मनुष्य के प्रयासों को गति देता है।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।वह अपनी प्रतिक्रियाओं के द्वारा समाज एवं स्वयं की उन्नति करना चाहता है।यह उन्नति उसे तभी प्राप्त हो सकती है,जबकि वह अपनी संस्कृति एवं सभ्यता के शाश्वत मूल्यों की दैनिक जीवन में प्रयोग करना आरंभ कर दे।यह कार्य शिक्षा के द्वारा ही संभव किया जा सकता है।शिक्षक ही वह माध्यम है जो मार्गदर्शक के रूप में समाज को सही दिशा दिखाता है।
शिक्षक के सैद्धान्तिक स्वरूप को इस रूप में परिभाषित किया जा सकता है कि " गुरु देता है और शिष्य ग्रहण करता है,किंतु एक के पास देने के लिए कुछ होना चाहिए और दूसरे का द्वार लेने के लिए खुला रहना चाहिए" परंतु समय के साथ समाज में परिवर्तन आया है और उसके अनुसार शिक्षक का दायित्व और स्वरुप बदलता गया है।इस बदलते परिवेश में भी शिक्षक समाज का निर्माता है,इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता
जरूर भीड़ में भीड़ है 'शिक्षक '
मगर समाज की रीढ़ है 'शिक्षक'
नागरिकों का निर्माता 'शिक्षक
सबको आगे बढ़ाता 'शिक्षक
कार्य कर पीछे छुप जाता शिक्षक
समर्पण का पाठ सबको सिखलाता शिक्षक
कभी माँ का स्नेह तो कभी बाप के डर का अहसास दिलाता शिक्षक
दोस्तों यूँ ही नहीं पूजा जाता शिक्षक
हम परिंदों की नीड़ है शिक्षक
समाज की रीढ़ है शिक्षक
शिक्षक की समाज में भूमिका चिरकाल से ही महत्वपूर्ण रही है जैसा कि उक्त पंक्तियों से स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षक समाज का वह आधार स्तंभ है जिस पर ही इसके सफलताओं की अट्टालिकाएं टिकी हैं। शिक्षक के समाज में भूमिका को निम्न आधारों पर समझ सकते हैं-
1 शिक्षक समाज का आधार स्तंभ होता है।
2 समाज में शिक्षक की भूमिका निर्माता की होती है ।जो व्यक्तित्व निर्माण का कार्य करता है ।जिससे नागरिकों और समाज का निर्माण जुड़ता है इसलिए उसे समाज मूर्ति का शिल्पकार कहा जाता है।
3 शिक्षक का नेतृत्व स्वयं सबके लिए उदाहरण होता है उसका जीवन एक सीख होना चाहिए।
4 शिक्षक ज्ञानी होता है उसे किताबी ज्ञान से ऊपर बौद्धिक ज्ञान से परिपूर्ण होना चाहिए।
5 शिक्षक समाज सुधारक के रूप में समाज में व्याप्त बुराइयों को अपने शिक्षा से समाप्त करने का प्रयास करता है।
6 समाज के बदलते स्वरूप के अनुसार शिक्षक बदलाव के अनुसार अपने अस्तित्व को बचाने को तत्पर होता है ।
शिक्षक समाज संबंधों के और भी आयाम हो सकते हैं और इन आयामों में समय के साथ बढ़ावा और बदलाव को देखा जाता रहा है। समाज में शिक्षक का महत्व इस बात को लेकर और भी तार्किक लगता है कि उसे हम एक शरीर कुछ शब्दों या एक समय काल में नहीं बांध सकते। शिक्षक के महत्व विश्लेषण भी है और विवेचन भी यह तर्क भी है और परंपरा भी। इस के विविध रूप और कई आयाम है। शिक्षक के बिना एक सभ्य, संपन्न, समझदार और जिम्मेदार समाज की कल्पना व्यर्थ है। समाज में शिक्षक के महत्व पर चर्चा की जा सकती है -
शिक्षक अध्ययन,अवलोकन और अनुभूति के जरिए ज्ञानार्जन सिखलाता है।समाज की जिज्ञासा को तार्किक उत्तरों के माध्यम से शांत करता है।
सामाजिक समानता हेतु नित्य नवीन खोज करता है। यह खोज विचारों से प्रारंभ होकर वस्तु परख होती है।
शिक्षक समाज के सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक और तकनीकी आयामों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
शिक्षक निर्माता बनकर नागरिकों का निर्माण करता है शिक्षक पूंजीवादी नहीं समाजवादी और ज्ञानवादी होता है। जिसका कार्य अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समस्त समाज को नवीन सफलता दिलाना है।
सभ्यता के प्रारंभ और विकास में शिक्षक का योगदान रहा है। भले उस काल में शिक्षक को गुरु शिक्षक या आचार्य जैसे नाम न मिले हों लेकिन उनके काम के अस्तित्व को हम इन सभ्यताओं में ढूंढ सकते हैं।
जाने किस भट्टी में गुरु रूपी लोहा तैयार हुआ होगा जिसे कठोरता के साथ सावधानी पूर्वक मिट्टी को गढ़कर व्यक्ति और व्यक्तित्व का निर्माण करने का कार्य करना था। यह जरूर अनुशासन की भट्टी रही होगी। जिसके आधार पर बड़े-बड़े व्यक्तित्व को गुरु होने का गर्व मिला। गुरु ने प्राचीन काल में जिस तन्मयता से इस कर्तव्य का निर्वहन किया और कृष्ण अर्जुन राम जैसे अनेकों व्यक्तित्व दिए वहीं शिष्यों के गुरु के ऊपर विश्वास और भक्ति को नहीं नकारा जा सकता। यही कारण था कि एक आभासी गुरु एकलव्य जैसे शिष्य से गुरू दक्षिणा में अपना परम हथियार अंगूठा मांगता है और शिष्य सहर्ष उसी क्षण काटकर उनके कदमों में रख देता है। यह अंधभक्ति नहीं गुरु शिष्य परंपरा की मिसाल है जो आज तक शाश्वत है। हमारी संस्कृति रही है कि हमारे लिए किए गए कार्यों का आभार देना हम नहीं भूलते।
प्राचीन काल से मध्यकाल तक का सफर समाज ने जिन गुरुओं आचारयों और शिक्षकों के आधार पर तय किया उनमें द्रोणाचार्य, वशिष्ठ और कौटिल्य जैसे ज्ञानी,
बुद्ध महावीर जैसे तत्व मर्मज्ञ, शंकराचार्य और सूफी संत जैसे नवीन विचारक, ईसा और मोहम्मद जैसे धर्म प्रवर्तक थे। इन्होंने मनुष्य को ज्ञान कपाट को ना केवल खोला बल्कि सार्वभौमिक सत्य शिक्षा के ऊपर पड़ी धूल और जंग को समाप्त करने का कार्य भी किया। जिसके कारण ही राजाओं के अस्तित्व की लड़ाई ,विस्तारवादी मुस्लिम रणनीति और संपन्नता पाने की राजनीतिक लड़ाई के माहौल में भी सामाजिक सौहार्द्र बना रहा।
अंग्रेजों के आगमन के बाद शिक्षक और शिक्षा का भी उपनिवेशवादी स्वार्थों के लिए रूपांतरण किया गया। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीयता के ऊपर अपने जरूरतों के हिसाब से शिक्षा को बदलने का प्रयास किया परंतु जहां का परिवेश माटी और संस्कृति में ज्ञान का प्रवाह हो उन्हें मैकाले की शिक्षा नीति के आधार पर स्वर भौमिक शिक्षा से दूर नहीं रखा जा सकता। इस काल में विवेकानंद ने जहां हमारी धर्म और संस्कृति के माध्यम से तो टैगोर ने कला साहित्य के माध्यम से और गांधी ने अपने प्रभावी विचारों के माध्यम से जनता और समाज को भटकाव से दूर रखा। इसी क्रम में सर्वपल्ली डॉक्टर राधाकृष्णन भी आए जिन्होंने शिक्षक से राष्ट्रपति तक का सफर तय किया शिक्षा और उसके विकास के लिए अपना जीवन तो लगाया ही शिक्षकों के समाज में योगदान हेतु आभार और सम्मान प्रकट करने के उद्देश्य से अपने जन्मदिन को 5 सितंबर को शिक्षक दिवस का रूप दिया।

इस लंबे सफर में शिक्षक द्वारा दिए ज्ञान ने मानव समाज को विकसित किया तो कहीं-कहीं भ्रष्ट भी। ज्ञान निरंतर आधुनिक होता गया तो जड़ीभूत भी। विस्तार करता गया, गहन होता गया तो वह सिमटा भी ,उथला भी हुआ। ज्ञान मनीषियों की साधना बना,तो चतुर तिकड़मियों का कारोबार भी। उसने लोक में सदियों से संचित जीवन ज्ञान का रूप पाया तो उसी की अंधश्रद्धा भी बना। उसने जंजीरों से मनुष्य को जकड़ दिया तो उसके अस्तित्व के अर्थ की परवाज भी बना। उसने मनुष्य को यात्राएं दी,सपने दिए ,साहस दिया ,सृजन और मुक्ति दी।
21वीं सदी में समाज निरंतर परिवर्तित हुआ है इस बदलते स्वरूप में शिक्षक और शिक्षा का स्वरूप बदला है जिसे हम सकारात्मक नकारात्मक और वैश्विक प्रभाव के आधार पर देख सकते हैं।
21वीं सदी में शिक्षा व्यापक क्षेत्र धारण कर विभिन्न विषयों तक पहुंचा है। नए जिज्ञासाओं को व्यापक विचारों और खोजों के माध्यम से हल किया गया है। अनुत्तरित प्रश्नों जैसे ब्रह्मांड,अणु परमाणु, प्राकृतिक क्रियाकलापों के कारणों को ढूंढने के लिए क्रमबद्ध रूप से प्रयास किया गया और बहुत हद तक इसमें सफलता मिली है। नवीन तकनीक का विकास समझ को सरलता प्रदान कर रहा है। राज्य प्रयास कर रही है कि नीतियों अधिनियम के माध्यम से शिक्षा नीति में व्याप्त बुराई को दूर किया जाए । इसका ही प्रमाण है 2009 में पारित शिक्षा का अधिकार अधिनियम जो शिक्षक समाज और माता-पिता के दायित्वों का निर्धारण करता है। जिससे नवीन पीढ़ी को ऐसी शिक्षा मिल सके जो न केवल रोजगार परक हो बल्कि नैतिक मूल्यों को भी बनाए रखे।
21वीं सदी में हुए बदलावों ने एक नवीन नकारात्मक प्रभाव को भी जन्म दिया है जिसमें शिक्षा का व्यवसायीकरण प्रमुख समस्या है। आज शिक्षक और शिक्षा संस्थान शिक्षा के मूल उद्देश्य से भटक के नजर आते हैं। इसका परिणाम हमें समाज के भटकाव में ढूंढना पड़ेगा। यह नवीन शिक्षा की ही देन है जिसने नैतिक मूल्यों राष्ट्रहित के ऊपर धन और भौतिकता को मानव जीवन का सार तत्व बना दिया है। भ्रष्टाचार, लूट ,बलात्कार ,आतंकवाद नक्सलवाद और कुछ नहीं गलत शिक्षा संस्थानों द्वारा दिए गए गलत शिक्षा का गलत लोगों द्वारा कृत्य है जो हमारे समाज की अस्मिता पर एक प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है। बदलते परिवेश में सूचना प्रौद्योगिकी ने जहां शिक्षा को नया आयाम प्रदान किया वहीं समाज में शिक्षक की भूमिका को कम करने का प्रयास भी किया है। आधुनिक समय में भी हम कुछ आध्यात्मिक और धार्मिक संतों के व्यवसाय को शिक्षा का स्वरूप मानकर अंधभक्ति कर रहे हैं जिससे मूल संस्कृति धर्म और भारतीय आध्यात्म धूमिल हुआ है।
वैश्विक परिवेश में 21वीं सदी में शिक्षा समाज को रोजगार का माध्यम तो है ही साथ ही साथ जिज्ञासाओं की व्यापकता भी है। शिक्षक का स्वरूप जरूरतों के हिसाब से विषय विशेषज्ञ का हो गया और समाज सर्वज्ञानी होना चाहता है इसलिए एक शिक्षक उसकी अपेक्षाओं को पूर्ण नहीं कर सकता। इस नवीन विचार ने तकनीक के माध्यम से ज्ञान को सबकी पहुंच में कर दिया है। परंतु अब भी यहां वही प्रश्न उठता है कि हम पुस्तकीय ज्ञान से आगे नैतिक ज्ञान का रास्ता पीछे छोड़ते तो नहीं जा रहे हैं?
यदि ऐसा नहीं है तो प्रकृति का दोहन और व्यक्तित्व का अवमूल्यन जैसी समस्याएं विकराल रूप धारण क्यों कर रहीं हैं? हम भौतिकता के तमस में उस समाजवादी प्रकाश को क्यों नहीं देख पा रहे हैं जिसके सहारे हम यहां तक पहुंचे हैं?
इन सभी बातों के बावजूद पिछले दिनों हुए अनेक आंदोलन ऐसे रहे हैं जिन्होंने बड़े पैमाने पर शिक्षा के समाजीकरण की प्रक्रिया को तीव्र किया है। भारत में लोकपाल की स्थापना के लिए होने वाले आंदोलन ने अदालत कानून और सरकारी कामकाज के बारे में लोगों को बेहद समझदार बनाया है। इसी के साथ हम अमेरिका के आकू पाई वॉल स्ट्रीट आंदोलन की चर्चा कर सकते हैं। यह आंदोलन पूरी दुनिया में जंगल की आग की तरह फैलता जा रहा है और इसमें बुद्धिजीवियों की खुली शिरकत ने इसे जनता के नए किस्म के शिक्षण के मंच में बदल दिया है।
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि ज्ञान के समाजीकरण में तेजी आई है। कुछ दिनों पहले तक ऐसा लगता था कि नौजवान पैसा छोड़कर और किसी चीज पर ध्यान नहीं दे रहे हैं लेकिन आज ऐसा नहीं है। भूमंडलीकरण के चलते जानकारी के अनेक नए दरवाजे भी खुले जिनके जरिए लोगों ने पर्दे के पीछे के असली खेल को देखना शुरू कर दिया और "खाओ पियो मस्त रहो"का जीवन अपनाने के बजाय इस जानकारी का इस्तेमाल अपने वातावरण को आदमी के जीने लायक बनाने के लिए करना शुरू कर दिया है। क्या आज से 20 साल पहले सोचा जा सकता था कि तमिलनाडु गांव के रहने वाले लोग परमाणु संयंत्र की खामियों और खूबियों के बारे में सार्वजनिक तौर पर वैज्ञानिकों की तरह बहस करना शुरू कर देंगे। या अपने देश में और दुनिया में नए किस्म के समाज के निर्माण के लिए सोचने समझने वालों का समय है। पुराने तरीके से ना तो संतुष्ट हो रहे हैं ना ही पुराने किस्म के समाज में एडजस्ट करने को राजी हैं।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है आज भी समाज का एक तबका सक्रिय, जागरूक, प्रभावी और नैतिकता का प्रतिनिधित्वकर्ता है तो यह उन शिक्षकों का ही प्रयास है जिन्होंने इस बदलते वातावरण में भी शिक्षक की पद की गरिमा को समझा और अपने दायित्व का निर्वहन अपेक्षित रूप में किया है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि गुरु चुनते समय हमेशा उसके व्यक्तित्व का ध्यान रखना चाहिए। केवल तभी उसके शब्दों का मूल्य हो सकता है क्योंकि उनका व्यक्तित्व संचारण यंत्र जैसा कार्य करता है। वह संचार ही क्या करेगा यदि उसमें वह आध्यात्मिक शक्ति है ही नहीं। उदाहरण स्वरुप यदि बिजली का चूल्हा गरम है तो वह उष्णता की तरंगे प्रवाहित कर सकता है, किंतु यदि वह गर्म नहीं है तो उसके द्वारा ऐसा होना असंभव है। इसी प्रकार गुरु से भी मानसिक तरंगे निकलती है जो शिष्य के चित्त तक पहुंचती है अंततः गुरु अतुलनीय है परंतु यदि तुलना हो तो इस रूप में होनी चाहिए
इनकी विशालता की तुलना तुम आसमां से कर सकते हो
इनकी बुद्धिमता की तुलना तुम पार्वती के ललना से कर सकते हो
इनकी स्नेह की तुलना तुम यशोदा अम्मा से कर सकते हो
गुरु की पवित्रता की तुलना तुम मां गंगा से कर सकते हो।